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2 अक्टूबर 2018 से अन्ना हजारे का लोकपाल की नियुक्ति के लिए अपने गाँव मे आंदोलन शरू

क्या कारण है की भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण की बात करनेवाली केंद्र सरकार केंद्र में लोकपाल नियुक्ती के लिए हिचकिचा रही है? इसलिए 2 अक्टूबर 2018 को मेरा आंदोलन मेरे गांव रालेगणसिद्धी में होगा।

इस सरकार ने चुनाव के वक्त हम भारतवासियों को आश्वासन दिया था की, हमारी सरकार सत्ता में आती है तो हम लोकपाल की नियुक्ती करेंगे। क्योंकी हमारी सरकार भ्रष्टाचार मुक्त भारत निर्मीती के लिए कटीबद्ध है। लोकपाल  कानून भ्रष्टाचार को रोकने के लिए महत्वपूर्ण पर्याय होते हुए भी सरकार लोकपाल नियुक्ती नहीं कर रही है।

            इस सरकार को सत्ता में आने के बाद चार साल से जादा समय बित गया है। लेकिन सत्ता में आते है तो लोकपाल, लोकायुक्त नियुक्त करने का आश्वासन जनता को देनेवाली यह सरकार आश्वासन का पालन नहीं कर रही है। सत्ता में आने से पहले जनता लोकपाल, लोकायुक्त कानून बनाने के लिए लढ रही थी। उस वक्त आज इस सरकार में जो मंत्री शामिल है उसमें से श्रीमती सुषमा स्वराज जी, और अरूण जेटली जी ने लोकपाल कानून बने इसलिए पहली सरकार के विरोध में लडने के लिए खडे हुए थे। केंद्र में लोकपाल और राज्यो में लोकायुक्त कानून बनाने के सपोर्ट में उस सरकार के विरोध में क्या क्या बोलते थे उसका पुरा रेकॉर्डींग किया हुआ है। लेकिन आज सत्ता में आने के बाद चार साल में लोकपाल, लोकायुक्त बारे में कुछ बोलते तक नहीं है। जो बोल रहे थे वह अपने स्वार्थ के लिए भुल गए है। हमारा संविधान सर्वश्रेष्ठ है। संविधान के आधार से संसद में कानून बनते है। और उस कानून के आधार से देश चलता है।

            लोकपाल, लोकायुक्त कानून 2013 में संसद के दोनों सदनों ने बनाया। 1 जनवरी 2014 को राष्ट्रपतीजी के हस्ताक्षर हुए और देश में लोकपाल, लोकायुक्त कानून लागू हुआ। लेकिन यह सरकार सत्ता में आ कर चार साल हो गये हैं लेकिन लोकपाल, लोकायुक्त नियुक्ती के लिए अलग अलग बहाना बना रही है। कभी विरोधी पक्ष नेता ना होने के कारण लोकपाल की नियुक्ती नहीं कर सकते। ऐसा बहाना बना कर जनता को गुमराह करते रहे। लोकपाल नियुक्ती को टालते गए। कभी बोलते है कानूनविद का पद रिक्त है इसलिए लोकपाल नियुक्ती नहीं कर रहे है। जानबूझकर लोकपाल नियुक्ती टालते गए।

            अभी सरकार शोध समिती का बहाना बनाकर लोकपाल नियुक्ती टाल रही है। 4 साल से सरकार जनता की दिशाभूल करने के लिए अलग अलग बहाना बना रही है। और लोकपाल नियुक्ती को टाल रही है। अगर लोकपाल नियुक्ती की इच्छा होती तो, लोकपाल की नियुक्ती चार साल में असंभव नहीं थी। लेकिन सरकार में इच्छाशक्ति का अभाव हैं।  सरकारने ऐसे करना यह इस देश के लिए और देशवासियों के लिए दिए हुए आश्वासन का पालन नहीं करना यह गंभीर बात है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार, दो बार नहीं बल्कि कई बार सरकार को लोकपाल नियुक्ती करने के बारे में फटकार लगाई है। सरकार संसद में बने कानून का और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं कर रहीं है। जिस कानून के आधार पर हमारा देश चलता है वह कानून क्या सिर्फ झुग्गी झोपडी में रहनेवाले सामान्य नागरिकों के लिए है? कानून सरकार के साथ साथ देश में रहनेवाले सब के लिए होता हैं। कानून का पालन सरकार करेगी तो देश के सामान्य नागरिक भी उसका अनुकरण करेंगे। लेकिन यह सरकार लोकपाल, लोकायुक्त कानून अपनी सरकार की मुसिबत ना बने इस कारण लोकपाल नियुक्ती के लिए हिचकिचा रही है।

            क्या सरकार को ऐसे नहीं लगता है कि, भारतरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरजी ने एक अप्रतिम संविधान बनाया हैं। हमारा देश कई देशों से बड़ा लोकतंत्रवादी देश हैं। अलग अलग जातीपाती के लोग होते हुए भी सत्तर साल से जादा समय सब मिलकर देश को चलाते आए हैं। उसका कारण है हमारा अप्रतिम संविधान। उस संविधान के आधार पर कानून बना। उस कानून का सरकारने पालन नहीं करना यह संविधान का पहला अपमान है। और दुसरा, देश की संसद जो सर्वोच्च हैं उस संसद ने जो कानून बनाया उस संसद का अपमान है। न्याय व्यवस्था सर्वोच्च होने के कारण यह सर्वोच्च न्यायालय का भी अपमान है। इस कानून पर राष्ट्रपतीजीने हस्ताक्षर किए। उन राष्ट्रपती पद का अपमान है। विशेषता यह कानून संसद के दोनो सदनों में बहुमत से ही नहीं तो एकमत से पारित किया था। आज इस सरकार में प्रमुख पद पर जो मंत्री विराजमान है वह मंत्री कानून बनाते समय संसद में बैठे थे वह मंत्री संसद में हुए इस कानून को कैसे भुल गए है। यह प्रश्न है। इस बात से यह स्पष्ट होता है की, सत्ता की नशा उच्च स्तर के ग्यानी और पढ़े लिखे लोगों को भी कितनी बेहोश कर देती है। इसका यह उदाहरण है।

            सरकार चलानेवाले सभी जिम्मेदार लोगों ने समाज के प्रमुख होने के कारण इस बात को सोचना है कि, देश की जनता हमारे तरफ देख रही है। हमारा अनुकरण करती है। हम जैसे बर्ताव करेंगे उसका पालन जनता भी वैसे ही करने की कोशिश करती है। सरकार संसद में बने कानून की और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का पालन नहीं करती है तो देश की जनता ने इससे क्या सिख लेनी है? लोकपाल कि नियुक्ती 4 साल से सत्ता में आने के बाद भी सरकार नहीं कर रही है। हमे लगता है उसका प्रमुख कारण यह हो सकता है कि, लोकपाल के जाँच क्षेत्र में प्रधानमंत्री आते है। जनता ने लोकपाल के पास प्रधानमंत्री के भ्रष्टाचार के सबूत भेज दिये तो लोकपाल प्रधानमंत्री की जाँच कर सकता है। ऐसा लोकपाल कानून में लिखा है। उसके साथ ही जो पूर्व प्रधानमंत्री रहे हैं उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के सबूत जनता लोकपाल को भेजने से उनकी भी जाँच लोकपाल कर सकता है। लोकपाल एक व्यक्ती नहीं हैं। तो लोकपाल एक पीठ हैं। जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय में जज्जों का पीठ न्यायदान का काम करता हैं उस प्रकार लोकपाल का पीठ इनकी जाँच करेगा।

            प्रधानमंत्री के अंतराष्ट्रीय संबंध, बहिस्त या अंतर्गत सुरक्षा, सार्वजनिक सुव्यवस्था, अण्विक उर्जा और अंतराल संबंधी लोकपाल का पुरा पिठ जिसमें लोकपाल भी होते है। ऐसे लोकपाल के सभी सदस्य मान्यता देते है तो उनकी जाँच लोकपाल कर सकता है। इस खतरे के कारण सरकार को लोकपाल नियुक्ती नहीं चाहिए। अगर लोकपाल पिठ के दो तृतियांश सदस्य मान्यता नहीं देते तो उनकी जाँच नहीं होगी। लोकपाल प्रधानमंत्री के मंत्री मंडल में जो सदस्य मंत्री गण है, उनके भ्रष्टाचार के सबूत जनता भेजती है तो लोकपाल पिठ उन मंत्रियों की जाँच कर सकता है। इसलिए सरकार को लोकपाल नहीं चाहिए। पहले राज्यसभा या लोकसभा के सांसद रहे है। ऐसे पुर्व सांसदों के खिलाफ सबूत जनता लोकपाल को देती है तो लोकपाल पिठ उनकी जाँच करेगी।

            केंद्र सरकार के सभी जन प्रतिनिधी  (लोकसेवक) और सभी क्लास अ,ब,क,ड के अधिकारी जनसेवक है। ऐसे सभी जनसेवकों में किसी भी जनसेवकों के भ्रष्टाचार के सबूत नागरिक लोकपाल को भेजती है तो लोकपाल पिठ यकिन करेगा और भ्रष्टाचार के सबूत है तो लोकपाल उनकी जाँच करेगा। इसलिए सरकार को लोकपाल नियुक्ती नहीं चाहिए।

            किसी संघराज्य के संबंधित सभी लोकसेवक है। उनमें क्लास क और ड में आनेवाले अधिकारी है। या समकक्ष वरिष्ठ है उनके सबुत जनता से कोई भी नागरिक लोकपाल को भेजता है तो लोकपाल उनकी जाँच कर सकती है। कोई भी व्यक्ती किसी सरकारी मंडल का सदस्य है, किसी संस्था या निगम का सदस्य है, किसी प्राधिकरण, संगठन, स्वायत्त संस्था का अध्यक्ष या सदस्य रहा है, जो संसद के अधिनियमा अंतर्गत स्थापन हुआ है या केंद्र शासन द्वारे वित्त पुरवठा किया जाता है ऐसे सभी संस्था के भ्रष्टाचार के सबूत जनता लोकपाल को भेजती है तो लोकपाल इनकी जाँच करेगा। प्रधानमंत्री की जाँच गुप्त पद्धती से (इन कॅमेरा) की जायेगी। इसलिए केंद्र सरकार को लोकपाल नियुक्ती नहीं चाहिए।

            लोकपाल, लोकायुक्त कानून बिल 1966 से लेकर आज तक 8 बार संसद में रखा गया है। लेकिन किसी भी पक्ष-पार्टीने लोकपाल, लोकायुक्त कानून को पारित नहीं होने दिया। क्योंकी लोकपाल, लोकायुक्त कानून किसी भी पक्ष-पार्टी को नहीं चाहिए। लेकिन इस सरकारने जनता को आश्वासन दिया था और आज पालन नहीं कर रहे है। इसका कारण हो सकता कि सरकार को खतरा लग रहा हो। जब 2011 में देश की जनता जाग गई और संगठित हो कर पुरे देश में लोकपाल, लोकायुक्त की मांग के लिए देश में गांव-गांव के युवक, युवती और जनता रास्ते पर उतर गई थी तब तत्कालिन सरकार को और दोनों सदन को लोकपाल लोकायुक्त कानून एक मत से करना पडा था। अब नरेंद्र मोदी सरकार लोकपाल लोकायुक्त कानून का अंमल नहीं कर रही है। इसलिए फिर से एक बार 2011 जैसे आंदोलन जनता को करना होगा। तब इस देश के भ्रष्टाचार को बडे पैमाने पर रोकथाम लगेगी।

16 अगस्त 2011 में मैने रामलिला मैदान में करेंगे या मरेंगे इस ध्येयवाद से आंदोलन शुरू किया था। और देश की जनता मेरे जैसे एक सामान्य फकिर के साथ उस आंदोलन में उतर गई थी। तब देश के जनता के दबाव के कारण यह कानून बना था। भ्रष्टाचार को रोखथाम लगानेवाले इस कानून पर अंमल हो इसलिए अब मैने 2 अक्टूबर 2018, गांधी जयंती के अवसर पर लोकपाल लोकायुक्त नियुक्ती करना और किसानों की समस्या छुडाने के विषय को ले कर फिर से मेरे गांव रालेगणसिद्धी में आंदोलन करना तय किया है। सूचना का अधिकार के लिए 1995 से ले कर 2002 तक महाराष्ट्र में आंदोलन किए। 2003 में पहले महाराष्ट्र में सूचना का अधिकार कानून बना। और 2005 में पुरे देश के लिए संसद में कानून बना। 8 साल हम जनता की लडाई चलने के बाद कानून बन गया था। शुरूवात में उस कानून का महत्व जनता को समझ में नहीं आया था। अब उसका लाभ जनता के समझ में आ गया। कुछ हद तक भ्रष्टाचार को रोखथाम लग गई। वैसे लोकपाल लोकायुक्त कानून पर अमल हो गया तो भ्रष्टाचार को कितना रोकथाम लग सकता है देश की जनता को एक साल में ही समझ में आयेगा। मैने 25 साल की उम्र में तय किया था कि जब तक जिऊँगा समाज और देश की सेवा करूँगा और जिस दिन मरूँगा देश की सेवा करते करते मरूँगा। उम्र के 50 साल कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। इस वृत्ती से सेवा करते आया हूँ। जिवन में बँक अकाऊँट का किताब कहां रहता है इसका पता मुझे नहीं सिर्फ सेवा करते आया हूँ। 2 अक्टूबर 2018 का होनेवाला आंदोलन यह भी मेरी समाज और देश की सेवा है। शरीर में प्राण है तब तक सेवा करते रहूँगा।
धन्यवाद।

दि. 28/07/2018

भवदीय,
कि. बा. तथा अण्णा हजारे

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